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रचना और तुम
मेरी रचना के अर्थ बहुत हैं
जो भी तुमसे लग जाय लगा लेना
मैं गीत लुटाता हूँ उन लोगों पर
दुनियाँ में जिनका कुछ आधार नहीं
मैं आँख मिलाता हूँ उन आँखों से
जिनका कोई भी पहरेदार नहीं
आँखों की भाषा तो अनगिन हैं
जो भी सुन्दर हो वह समझा देना।
पूजा करता हूँ उस कमजोरी की
जो जीने को मजबूर कर रही है।
मन ऊब रहा है अब इस दुनिया से
जो मुझको तुमसे दूर कर रही है
दूरी का दुख बढ़ता जाता है
जो भी तुमसे घट जाए घटा लेना
कहत है मुझ से उड़ता हुआ धुँआ
रुकने का नाम न ले तू चलता जा
संकेत कर रहा है नभ वाला घन
प्यासे प्राणों पर मुझ सा गलता जा
पर मैं प्यासा हूँ मरूस्थल सा
यह बात समंदर को समझा देना
चाँदनी चढ़ाता हूँ उन चरणों पर
जो अपनी राहें आप बनाते हैं
आवाज लगाता हूँ उन गीतों को
जिनको मधुवन में भौंरे गाते हैं
मधुवन में सोये गीत हजारों है
जो भी तुमसे जग जाए जगा लेना
- रमानाथ अवस्थी

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Poet's Address: 14/11, C-4 C Janakpuri, New Delhi
Ref: Naye Purane, September,1998
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