इस महीने
अभिषेक ~ सत्यकाम विद्यालंकार
आज हमारा है अभिषेक,
रक्तिम आज क्षितिज की रेख।
दशों दिशाएँ सखियाँ बनकर,
महासिन्धु से स्वर्ग कलश भर
रंग - रंग के परिधानों में,
नभ - मन्डल से उतरीं भू पर।
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कालिदास ~ नागार्जुन
पर पीड़ा से पूर-पूर हो
थक-थक कर औ चूर-चूर हो
अमल-धवल गिरि के शिखरों पर
प्रियवर! तुम कब तक सोये थे?
रोया यक्ष कि तुम रोये थे?
कालिदास! सच-सच बतलाना |
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